Wednesday, 9 March 2011

शाशवत सत्य से.......



अस्तित्व.......                                                          

दो पाँव
रखने भर
को
कुछ जमीं
और
थोडा सा


 
खुला आसमान
जिसके बीच
बाहें पसारकर
महसूस
कर सकूँ
अपनी
साँसों को
क्योंकि

अक्सर
लोगों को
कहते सुना है
मैंने
कि
मैं
अभी
जिन्दा हूँ....


.......kavs"हिन्दुस्तानी"..!! 
...............................................................................

अंतिम सफ़र....

दूरी
धरती के
आकाश से
मिलन की...


मौत
जीवन चक्र से
जुडी
अंतिम प्रक्रिया...



कफ़न
देह पर
पहना जानेवाला
अंतिम वस्त्र....


संसार
पहली किलकारी से
अंतिम क्रंदन
के बीच का
मायाजाल...


जीवन
सुख-दुःख
निश्चित-अनिश्चितता
सही-गलत
के बीच
झूलती हुई
एक कड़ी...

और आज
ये कड़ी
मायाजाल
को भेदकर
श्वेत आवरण
में सिमटी
अंतिम परिणिति
से
एकाकार
होती हुई

चली
जा रही है
धरती से
आकाश की ओर
अपने अंतिम सफ़र पर...!!

...........kavs"हिन्दुस्तानी"..!!
                                                                                       
.............................................................................

नियति......

मासूमियत से भरा
वो चेहरा
झुनझुने की
एक झुनझुनाहट पर
दस दस किलोलें भरता
माँ की गोद में
कि चलो
कोई तो है
जो
जीवन की
कंटीली राहों
से है बेखबर
मेरे होठों के
बीच की रेखा
जो फैल कर
मुस्कान
बन गयी थी
कुछ सोच कर
फिर अपने
दायरों में
सिमट गई
कि
कभी तो
इसे भी
उन गर्म हवाओं से
दो-चार होना पड़ेगा
जो जीवन की
कंटीली राहों
पर चलते हुए
बार-बार उखाड़ेंगी
उसके पाँव
पर फिर भी
थकने की उसे
इजाज़त नहीं
क्योंकि
चलना
उसका नसीब है
किन्कर्तव्यविमूध
थी मैं
जो
ये भी नहीं
कह सकती थी
कि
तू चलना
मत सीखना
क्योंकि
ये तो
नियति है
जिन्दगी की..!!!!!
......kavs "हिन्दुस्तानी"..!!
                              


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