Saturday, 31 March 2012

शिद्दते-फ़र्ज़

कहने से पहले 
एक दफा तो 
सोचा होता ..
जो टूटा वो 
तेरा विशवास 
नहीं...
तेरी खुशियों का
तलबगार कोई था....!

जिसकी धुनों
से बंधकर
सरगम बननी
थी जिन्दगी
उस से
कोई पर्दा
ना राज़ कोई था....!

खुशियाँ भर के
नाव मंझदार में
डूबा दी गयी
उसकी
बीच भंवर में
फंसकर
बचा ले उसे
ऐसा ना कारसाज़ कोई था....!

बड़ी बेपरवाह
सी - थी
कोशिश मेरी
जिसका कोई रूप
ना आकार कोई था
क्यूंकि मंझदार में
डोल रही नैया में
अपना ही सवार कोई था....!

रास्ता जो
उसने दिखाया
शिद्दते-फ़र्ज़
मैंने निभाया
कैसी थी
वो हिम्मत
कहाँ से आया
होंसला?
या फिर चमत्कार कोई था....!

बे-आबरू कर
कुचे से
निकाल दिया उसने
कहकर कि-
तुझे मेरी
जिन्दगी में
शिरकत का
ना अधिकार कोई था....!

कैसे भुला दिया तूने
तेरा आईना हूँ मै
जब तू टूटा
तो मै
बे-आवाज़ नहीं था
खुद से ज्यादा भरोसा
किया तुझ पर
आ जाए कभी याद
तो मुस्करा देना
सोच कर
ऐसा एक शख्स
कभी पास कोई था....!
....kavs"Hindustani"..!! 

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