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Wednesday, 26 September 2018




लौटना.. 
हां लौटना ही तो है 
एक दिन..

छूट जायेगा हर मोड़
टूट जाएगा हर जोड़
क्योंकि मुझे लौट जाना है
एक दिन...
ना कभी रही किसी से होड़...
हां अब याद रखती हूं..
मुझे लौट जाना है
एक दिन..

प्रीत की पाती ना बन सकी
प्यार की जाती ना बन सकी
क्योंकि मुझे लौट जाना है
एक दिन...
किसी की साथी ना बन सकी..
हां अब याद रखती हूं..
मुझे लौट जाना है
एक दिन..

ज़िन्दगी एक मेला है
और राही अकेला है
क्योंकि मुझे लौट जाना है
एक दिन
ना बाँधा सामान सब झमेला है
हां अब याद रखती हूं..
मुझे लौट जाना है
एक दिन..

प्रकृति ही मूल है
बाकि सब शूल है
क्योंकि मुझे लौट जाना है
एक दिन
याद रखे दुनिया ये तेरी भूल है
हां अब याद रखती हूं..
मुझे लौट जाना है
एक दिन..

©....Kavs"हिन्दुस्तानी"..!!

Sunday, 19 August 2018



नियति

मासूमियत से भरा वो चेहरा
झुनझुने की एक झुनझुनाहट पर
दस दस किलोलें भरता
माँ की गोद में..

कि चलो कोई तो है जो जीवन की 
कंटीली राहों से है बेख़बर
मेरे होठों के बीच की रेखा
जो फैल कर मुस्कान बन गयी थी
कुछ सोच कर फिर अपने
दायरों में सिमट गई..

कि कभी तो इसे भी
उन गर्म हवाओं से
दो-चार होना पड़ेगा
जो जीवन की
कंटीली राहों पर चलते हुए
बार-बार उखाड़ेंगी उसके पाँव..

पर फिर भी
थकने की उसे इजाज़त नहीं
क्योंकि चलना उसका नसीब है
किन्कर्तव्यविमूढ़ थी मैं
जो ये भी नहीं कह सकती थी
कि तू चलना मत सीखना
क्योंकि ये तो नियति है ज़िन्दगी की..!!!!

©....Kavs"हिन्दुस्तानी"..!!

Wednesday, 15 August 2018



अपनी मज़बूती पर 
इठलाता बाँध..
भूकम्प, बारिश, या तूफ़ान 
अडिग रहा धरा पर 
रख पैर अंगद समान..
पर क्षमताओं की भी 
होती हैं अपनी सीमाएं..

प्रकृति प्रदत प्रहार
लगातार बारबार ...
कर रहे खोखले
मज़बूती के बंधन 
कर सुनार की तरह 
धीरे-धीरे महिन वार..

वेग चाहे जैसा भी हो
करता है जब स्पर्श ..
भावना को, क्रोध को, 
आंसुओं को या पानी को..
बहा ले जाता है बहुत कुछ 
अपनी तीव्रता के साथ...

मज़बूती बह निकलती है
उस वेग के तूफ़ान में...
और शेष रह जाते हैं 
कुछ अवशेष ...
स्पष्ट करने को सार्थकता 
अपने अस्तित्व की...!!

©....Kavs"हिन्दुस्तानी"..!!

Wednesday, 9 March 2011


अंतिम सफ़र....

दूरी
धरती के
आकाश से
मिलन की...

मौत
जीवन चक्र से
जुडी
अंतिम प्रक्रिया...

कफ़न
देह पर
पहना जानेवाला
अंतिम वस्त्र....

संसार
पहली किलकारी से
अंतिम क्रंदन
के बीच का
मायाजाल...

जीवन
सुख-दुःख
निश्चित-अनिश्चितता
सही-गलत
के बीच
झूलती हुई
एक कड़ी...

और आज
ये कड़ी
मायाजाल
को भेदकर
श्वेत आवरण
में सिमटी
अंतिम परिणिति
से
एकाकार
होती हुई

चली
जा रही है
धरती से
आकाश की ओर
अपने अंतिम सफ़र पर...!!

©....Kavs"हिन्दुस्तानी"..!!